**चोर से महामानव तक**

 सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।

बौद्ध भिक्षु नागार्जुन की शिष्या राजरानी ने उन्हें हीरों से जड़ित स्वर्णिम भिक्षा पात्र भेंट स्वरूप दिया। नागार्जुन ने इस मूल्यवान भेंट को समभाव से धारण किया और अपने गंतव्य की ओर अग्रसर हो गए। अभी वे राह ही में थे कि एक चोर की नजर उनके भिक्षा पात्र पर पड़ गई। अभी वह योजना बना ही रहा था कि नागार्जुन ने स्वयं ही वह स्वर्ण पात्र फेंक दिया। यह देखकर चोर के भीतर प्रश्नों का झंझावात उमड़ पड़ा। वह उनके चरणों में गिर पड़ा।

     नागार्जुन ने चोर को समझाया और फिर ब्रह्मज्ञान में दीक्षित किया। दिव्य दृष्टि देकर उसके भीतर परमात्मा का दर्शन करा दिया। अपने भीतर दिव्य नजारे देखकर चोर के मुख से निकला --'धन्य हैं गुरुदेव, आप धन्य हैं।' किंतु जैसे ही वह उठा, उसके मन में एक विकट दुविधा आकार ले चुकी थी। वह दुविधा थी - 'अब मेरे व्यवसाय का क्या होगा? क्या अब मुझे चोरी करना छोड़ना पड़ेगा? फिर मैं अपने परिवार की जिम्मेदारियों का वहन कैसे करूँगा?'

     प्रत्युत्तर में नागार्जुन बोले -- 'इस विषय में बताना मेरा कार्य नहीं है। यह तुम्हारा निर्णय है। तुम्हें परम ज्ञान प्रदान कर दिया है। सभी प्रश्नों की कुंजी तुम्हें दे दी है। अब तुम इस ज्ञान का उपयोग करो और आगे का मार्ग स्वयं प्रशस्त करो।

चोर-- गुरुदेव। आप ही बताएं, मैं इस ज्ञान का उपयोग किस प्रकार करूँ?

नागार्जुन -- अपनी श्वासों पर ध्यान रखो। हर आती-जाती श्वास में सुमिरन का रंग भर दो। हर क्षण सुमिरन से जुड़े रहो।

   यह सुनकर चोर प्रसन्न हो गया और बोला -- 'बस गुरुवर, केवल यही करना है। पर ऐसा करने से क्या चोरी के पाप का भागी नहीं बनना पड़ेगा?

   नागार्जुन ने मौन रहते हुए हाथ ऊपर उठा दिया।

हर काल में सच्चे महापुरुषों की यही कसौटी रही। उन्होंने शाब्दिक रूप से इस बात पर बल नहीं दिया कि क्या करने योग्य है और क्या नहीं। उन्होंने सबसे पहले ब्रह्मज्ञान की दीक्षा दी। उनके व्यक्तित्व को ईश्वर के शाश्वत नाम के सुमिरन का आधार दिया। सद्गुरुओं ने मानव जाति को ऐसे अव्यक्त अक्षर से जोड़ा, जिसे भाषा में व्यक्त नहीं किया जा सकता; जिसे लिखा नहीं जा सकता; जो नि:शब्द है; नि:रूप है।

    संत चरण दास जी अपनी वाणी में कहते हैं - 'घट में ऊँचा ध्यान शब्द का सोहं सोहं माला।' अर्थात अंतर्घट में, श्वासों की माला में वह अव्यक्त नाम समाया है।

   ऐसा ही सुमिरन नागार्जुन ने भी उस चोर में प्रकट किया और उसे उसका अभ्यास करने के लिए कहा। कुछ दिनों के बाद चोर नागार्जुन के पास आया और चरणों में बिछ गया। बोला- आपने जैसा उपदेश दिया था, मैंने वैसे ही किया।

नागार्जुन - अच्छा है। साधो। साधो।

चोर - पर गुरुदेव, ऐसा करने से तो मेरा सबकुछ लुट गया। क्योंकि यदि मैं अपना ध्यान श्वासों पर एकाग्र करता हूँ तो चोरी कर ही नहीं पाता। इन श्वासों को पकड़ते पकड़ते मैं इतना शांत हो जाता हूँ कि मुझे चोरी करने की सुधि ही नहीं रहती। इस अभ्यास से मेरा मन इतना जागृत और चैतन्य हो उठता है कि मुझे सामने रखे रत्न व हीरे भी पत्थर या काँच के टुकड़े लगने लगते हैं। हारकर मैं खाली हाथ ही लौट आता हूँ। मेरा मार्ग दर्शन करें स्वामी।

  यही वास्तविक परिवर्तन है। माने सद्विचारों सत्कर्मों को व्यक्ति पर थोपा नहीं जाता। यह भाव परिवर्तन होता है केवल शाश्वत नाम के सुमिरन के प्रभाव से। साधक स्वयं यह निर्णय करने में सक्षम हो जाता है कि क्या करने योग्य है और क्या नहीं। उसकी ज्ञानेन्द्रियाँ कर्मेन्द्रियाँ करने योग्य कार्य ही कर पाती हैं।

   नागार्जुन सहज भाव से बोले- 'वत्स, अब सब तुम पर ही निर्भर करता है। तुम्हारे सामने दोनों मार्ग खुले हैं। एक वो मार्ग जिस पर चलकर तुम्हारा भविष्य भी अतीत की भांति अंधकारमय होगा। पर वहीं दूसरा मार्ग तुम्हारे जीवन का स्वर्णिम अध्याय लिखेगा। अत: अब चयन तुम्हारे हाथों में है। तुम चैतन्यतता को चुनते हो कि अचेतनता को?'

   चोर धीमे से बोला- 'अब मैं दोबारा अचेतनता को नहीं चुन सकता... मुझे चैतन्य चाहिए।... शांति आनंद चाहिए।... ऐश्वर्य नहीं, ईश्वर चाहिए।....

**ओम् श्री आशुतोषाय नम :**

"श्री रमेश जी"

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