सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।
गुरुदेव से बात करने की अभिलाषा लिए एक शिष्य उनके कमरे में गया। गुरुदेव बड़े प्यार से उसका हाथ थामा और उसे दीवार पर लगी बड़ी सी घड़ी के पास ले गए। घड़ी का पेंडुलम टिक् टिक् की आवाज करता हुआ इधर से उधर जा रहा था। उस शिष्य की ओर देखते हुए गुरुदेव बोले - 'सुनो तो, यह घड़ी क्या कह रही है?' शिष्य ने भोले भाव से उन्हें देखा, फिर मूक भाषा में उनका प्रश्न उन्ही से पूछ लिया। गुरुदेव ने पेंडुलम की ओर उंगली दिखाते हुए कहा- 'यह घड़ी बोल रही है देख-देख..।' फिर शिष्य की भृकुटी के मध्य में उंगली ले जाकर बोले- 'यह कह रही है देख-देख... अपनी आत्मा के प्रकाश को देख... भीतर की दिव्यता को देख... समय बीतता जा रहा है। एक पल भी व्यर्थ गंवाएँ बिना, अधिक से अधिक ध्यान साधना से आत्म साक्षात्कार कर... उससे जुड़। यदि यह कीमती समय एक बार हाथ से निकल गया, तो फिर लौटकर नहीं आएगा।'
शिष्य ने हाथ जोड़कर 'हाँ' में सिर हिला दिया। जानता था कि गुरुदेव ने कितनी खूबसूरती से उसके प्रश्न को बिना पूछे ही हल कर दिया था। दरअसल, वह बेकार की एक बात से परेशान हुआ जा रहा था। उस बात को सोच सोचकर यूँ ही समय गंवा रहा था। इस कारण से उसकी ध्यान साधना भी प्रभावित हो रही थी। गुरुदेव ने सीधे ही इंगित कर दिया- 'बेकार की बातों में पड़कर समय बेकार मत करो। अधिक से अधिक ध्यान साधना करो। ऐसा करने से तुम्हारा समय व्यर्थ नहीं जाएगा। साथ ही, तुम उस बेचैनी से निकल कर मन में सुकून महसूस करोगे।'
**ओम् श्री आशुतोषाय नम:**
"श्री रमेश जी"
