सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।
साधक - - गुरुदेव, हम ईश्वर को कैसे समझ सकते हैं?
Switch अरविंद - ईश्वर को समझने के लिए तो ईश्वर का ही रूप बनना पड़ेगा। रामकृष्ण परमहंस जी इस बात को बड़े सुन्दर उदाहरण से बताया करते थे - एक बार नमक की दो डलियों में बहस छिड़ गई कि सागर कितना गहरा है। तो पहली ने उसे समझाने के लिए सागर में छलांग लगा दी। जानते हो फिर क्या हुआ, वह कभी लौटकर ही नहीं आई। वह इस सागर में ही इकमिक हो गई। ठीक ऐसे ही यदि ईश्वर की थाह लेनी है, यदि हम उसे समझना चाहते हैं तो हमें उसमें ही विलीन होना होगा। उसी का रूप होना होगा। दूर किनारे पर खड़े होकर हम उसको नहीं समझ सकते।
साधक- गुरुदेव, मुझे अध्यात्म के मार्ग पर चलते हुए इतने वर्ष हो गये हैं। पर कोई प्रगति होती हुई नहीं दिखती। ऐसे में क्या करूँ?
महर्षि अरविन्द- अगर कभी मन में यह प्रश्न उठे कि जब इस मार्ग पर हुई प्रगति का पता ही नहीं चल रहा, तो इस पर चलने के लिए प्रेरणा कैसे मिलेगी? तो ध्यान रखें- ऐसा नहीं है कि किसी विशेष लक्ष्य को पाकर या किसी मंजिल पर पहुँच कर आपको आनंद की अनुभूति होगी। इस अध्यात्म मार्ग पर तो हर पग पर आनंद की अनुभूति है। आप चल रहे हैं, यही आपका पुरस्कार है, परम फल है। तो बिना सोचे समझे कि कितना चल लिए, कितना रह गया, आप चलते रहो... प्रगति का आकलन किए बिना चलने का ही आनंद लेना है।
जब आपका साधन ही आपका साध्य बन जाए, मार्ग ही मंजिल बन जाए, तब कोई हताशा निराशा नहीं, केवल आनंद ही जीवन का पर्याय होता है।
**ओम् श्री आशुतोषाय नम:**
"श्री रमेश जी"
