सर्व श्री आशुतोष महाराज जी की कृपा वर्षा.
क्या आप जानते हैं? अर्धनारीश्वर का ऐसा ही द्वेत पक्ष हम सब मनुष्यों में भी है। चाहे हम नर है या नारी, सूक्ष्म देह के स्तर पर हम सब अर्धनारीश्वर हैं। हमारे सूक्ष्म शरीर के बाई ओर इडा़ नाड़ी और दाई और पिंगला नाड़ी होती है -
*इडावामेस्थिताभागेपिड्लादक्षिणेस्मृता।।*(स्वरोदय शास्त्र,38)
दिन भर में हम कभी इड़ा से कभी पिंगला से सांस लेते हैं। योग शास्त्र कहता है, जिस समय इडा नाड़ी सक्रिय होती है, हमारे भीतर स्त्रियोचित गुण प्रबल होते हैं, जैसे की विनम्रता, शांति,सहनशीलता, इत्यादि। पर वही जब पिंगला नाड़ी सक्रिय होती है, तब हमारे स्वभाव में पुरुषोंचित गुणो का संचार रहता है, जैसे की जोश स्फूर्ति गतिशीलता इत्यादि।
परंतु योगियों का मत है की कभी इड़ा, कभी पिंगला, इस प्रकार द्वैत के बीच झूलते रहना ठीक नहीं है। इन दोनों के समन्वय तब स्थापित होता है, जब इन दिनों नाड़ियों के बीच तीसरी नाड़ी सुषमा जागृत हो जाती है।- 'सुषम्णामध्यदेशे' (स्वरोदय शास्त्र, 38)
एक पूर्ण गुरु ब्रह्म ज्ञान की दीक्षा देते समय न केवल इस सुषुम्ना नाड़ी को खोलते हैं, बल्कि इससे प्राणों को ऊपर -नीचे गुजारने की सुमिरन विधि भी सिखाते हैं। इसका ज्ञान गुरु के उपदेश माने ब्रह्म ज्ञान की दीक्षा से ही होता है; विद्या और करोड़ों शास्त्रों से नहीं।
जब प्राण इड़ा -पिंगला से नहीं, सुषुम्ना से गुजरने लगता है, तो वह हमारे व्यक्तित्व को प्रभावशाली पूर्णता, जिसमें नर- नारी दोनों के गुना का संतुलन होता है। अर्धनारीश्वर के दोनों पक्ष उसमें अभिव्यक्त होते हैं।
ॐ श्रीं आशुतोषाय नमः
श्री सियाबिहारी जी ✍️
