सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।
जब सद्गुरु हमें ब्रह्मज्ञान की दीक्षा देते हैं, तो हमारी भृकुटी में स्थित सूक्ष्म तृतीय नेत्र या पीनियल ग्रंथि सक्रिय हो जाती है। इस स्थल पर हमें अपनी प्रकाश रूप आत्मा का साक्षात्कार होता है। ब्रह्मज्ञान लेने के बाद हम जब जब ध्यान साधना करते हैं, तो हमारा मन इसी दिव्य स्थल के संपर्क में आता है। ऐसी अवस्था में मन के अचेतन स्तर से पुराने संस्कार और विचार अपने आप उभरकर इस सक्रिय तृतीय नेत्र तक आते हैं और इसमें वास करते हमारे उच्चतम चेतन मन (आत्मा) के संपर्क में आकर पूर्णतः नष्ट हो जाते हैं।
ब्रह्मज्ञान प्राप्त करने के पश्चात भृकुटी के बीचोबीच एक महान ज्वाला प्रकट होती है। इसे 'ज्ञान अग्नि' भी कहा जाता है। यह ज्वाला उस परम पुरुष या उच्चतम चेतन मन की ही प्रतीक है। इस महान ज्वाला या परम चेतना पर ध्यान लगाने से नकारात्मक विचारों - संस्कारों का रिसाव खत्म हो जाता है। श्रीमद्भगवद्गीता के चौथे अध्याय में कहा गया है - '... ज्ञानाग्नि सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते..'
अर्थात ब्रह्मज्ञान की ध्यान साधना के दौरान हमारे मन में व्याप्त विचार - संस्कार उभर-उभर कर ज्ञानाग्नि के संपर्क में आते हैं। इस परम चेतना के संसर्ग से वे जलकर नष्ट हो जाते हैं।
यही है ब्रह्मज्ञान का विज्ञान। गुरुदेव श्री आशुतोष महाराज जी द्वारा प्रदान की जाने वाली ब्रह्मज्ञान की साधना करने से मैं और मेरे जैसे लाखों साधक आज अपने मन की सलाखों से स्वतंत्र होकर जीवन जी रहे हैं।
**ओम् श्री आशुतोषाय नम :**
"श्री रमेश जी"
