सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।
इस बारे में महर्षि अरविंद बहुत बढ़िया बताते हैं। वे कहते हैं कि- खाना स्वास्थ्य वर्धन के लिए खाया जाता है। पर कई बार ऐसा होता है कि हम खाना खाकर रोगग्रस्त हो जाते हैं। हमें खाने से पूर्णतः लाभ नहीं मिलता। कारण? हमने खाने से सम्बंधित जो सारे नियम हैं, उनका पालन ठीक से नहीं किया। क्या खाना है, कब खाना है और कितना खाना है- इनका पालन न करने से आप खाने से जुड़े फायदे नहीं ले पाते।
उसी तरह से ध्यान साधना भी एक आचार-संहिता के साथ आती है। इसके भी बहुत सारे नियम होते हैं, जिनका पालन हमें करना होता है। आपकी सम्पूर्ण दिनचर्या में आपका आचरण, आपका व्यवहार, आपकी संगति क्या रही- इन सबका आपकी साधना पर असर पड़ता है। यदि आपने पूरे दिन तो तामसिक भोजन किया, तंबाकू, सिगरेट, मदिरा का सेवन किया, लोगों से अपशब्द कहे, नकारात्मक सोच रखी, वासनात्मक किताबें पढ़ी। और फिर आंखें बंद करके बिस्तर पर बैठ गए और कहें कि मेरा तो ध्यान ही नहीं लग रहा। मेरी एकाग्रता ही नहीं बन रही... तो ऐसा संभव नहीं है। साधना एक पैकेज की तरह है। आपको पूरे दिन अपने आहार - विहार - व्यवहार को शुद्ध रखना है, स्वयं को पल-पल सुमिरन व प्रार्थना से जोड़े रखना है - तभी साधना से अपेक्षित फल की प्राप्ति संभव है।
**ओम् श्री आशुतोषाय नम:**
"श्री रमेश जी"
