सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।
कई बार अध्यात्म का मार्ग बहुत नीरस लगता है और संसार में सरसता दिखाई देती है। तो ऐसे में क्या करें? इसी तरह के प्रश्न लेकर कुछ साधक महर्षि अरविंद जी के पास पहुंचे। महर्षि अरविंद जी बताते हैं - -
"मान लीजिए, एक शोध का कार्य है। उस गहन शोध में एक वैज्ञानिक को रस आता है। वह उसमें इतना डूब जाता है कि उसे भूख प्यास की भी होश नहीं रहती। वहीं एक नया छात्र यदि प्रयोगशाला में उस शोधकर्ता के साथ खड़ा हो जाए, तो उसे कुछ ही मिनटों के बाद बेचैनी महसूस होने लगेगी। कारण? उसका बौद्धिक स्तर उतना नहीं है, जिस स्तर पर पहुंच कर शोध से रस मिलता है। पर यदि वह छात्र उस कार्य को नीरस और उबाऊ कहकर छोड़ देता है, तो? तो वह एक साधारण इंसान ही रह जाता है। कभी वैज्ञानिक नहीं बन पाता।
ठीक ऐसे ही, अध्यात्म मार्ग पर चलते हुए यदि हमें रस नहीं आ रहा, तो इसका मतलब यह नहीं है कि मार्ग नीरस है। इसका अर्थ यह है कि अभी हमने उस स्तर को नहीं पाया, जिसपर पहुंच कर रस को ग्रहण किया जाता है। क्योंकि इसमें तो कोई दो राय है ही नहीं कि अध्यात्म का मार्ग अत्यंत सरस है। हमारे ऋषि मुनियों ने ग्रंथों में ऐसी अनेक वाणियां दर्ज की हैं, जिससे स्पष्ट होता है कि ज्ञान का मार्ग परम सुंदर और आनंदकंद है।"
दरअसल, अध्यात्म का मार्ग सर्वोत्तम शोध का मार्ग है। ब्रह्मज्ञानी संत परम वैज्ञानिक होते हैं उन्होंने ईश्वरीय शोध से उस अमृत रस को चखा होता है। परंतु जिस स्तर पर इसकी प्राप्ति होती है, उस तक पहुंचना साधारण मनुष्यों के लिए सहज और सरल नहीं है। ऐसे में आप यदि इस पथ को छोड़कर चले जाएंगे, संसार के आकर्षणों में उलझ जाएंगे, तो क्या होगा? आप भी एक साधारण मनुष्य की तरह जीवन जीकर, जीकर भी क्या वरण व्यर्थ करके चले जाएंगे।
**ओम् श्री आशुतोषाय नम:**
"श्री रमेश जी"
