**अगर ईश्वरीय मार्ग पर बढ़ना है तो मार्गदर्शक का हाथ पकड़ना होगा।**

 सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।

चाहे किसी भी धारणा को लेकर हम ईश्वर का शोध करें - सफल नहीं हो सकते। इस परम खोज की डगर जंगल के समान जटिल है। ऐसे अनदेखे पड़ाव मिलेंगे, अनहोनियाँ घटेंगी - जो केवल भटकाएँगी, उलझाएँगी। पर कहीं नहीं पहुँचाएँगी। इसलिए अगर इस ईश्वरीय मार्ग पर बढ़ना है, तो मार्गदर्शक का हाथ पकड़ना होगा। अपनी मनचली को, पूर्वाग्रहों को उसे समर्पित करना होगा।

   साईं बाबा बताते हैं "मेरे गुरुराया ने रस्सी से मेरी दोनों टाँगे बाँधी और मुझे कुँए में उलटा लटका दिया। मेरे पैर ऊपर और सिर नीचे था। लगभग चार घंटे के बाद उन्होंने मुझे कुँए से बाहर निकाला। फिर प्रेमपूर्वक पूछा - 'तुम ठीक हो न? कहो, कैसा अनुभव कर रहे हो?'

  'परमानंद, ब्रह्मानंद। अवर्णनीय आनंद जिसका शब्दों में वर्णन करना मेरे लिए असंभव है।' - मैं उमंग और अलमस्ती में झूम झूम कर कह उठा।"

   भगवत प्रेमियों, स्थूल बुद्धि से उक्त भाग पढ़ते हैं, तो कई प्रश्न चिन्ह दिखते हैं।क्योंकि इस भाग की भाषा बड़ी प्रतीकात्मक व गूढ़ है। इसलिए गूढ़ भाव से ही इसे समझा जा सकता है। गुरुदेव श्री आशुतोष महाराज जी बताते हैं - 'यह किसी बाहरी कुँए का नहीं, अंतर्जगत का वर्णन है। कबीर दास जी कहते हैं - 'गगन मंडल अमृत का कुँआ, जहाँ ब्रह्म का वासा।' अर्थात हमारे शरीर के शिरोभाग में एक सहस्त्रदल कमल है, जिसे 'गगन मंडल' कहा गया है। इसी में एक अमृत का कुँआ है, जिसमें साक्षात ब्रह्म निवास करते हैं। साईं को इस कुँए में उलटा लटकाने का अर्थ है कि गुरुराज ने उन्हें  ' Extrovert '

(बहिर्मुखी) से 'Introvert'  (अंतर्मुखी) कर दिया। ब्रह्म- 

ज्ञान की दीक्षा देकर उनकी चेतना की दिशा बदल दी। जो चेतना इन्द्रियों के माध्यम से बाहरी दुनिया की ओर दौड़ रही थी, उसे उलट कर अंतर्जगत में स्थित अमृत के कुँए यानि ब्रह्म से जोड़ दिया।"

**ओम् श्री आशुतोषाय नम :**

"श्री रमेश जी"

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