**बासी भोजन**

 सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।

महाबुद्ध की एक शिष्या थी, विशाखा! वह बचपन से ही अपने गुरु के आश्रम-बौद्ध विहार में जाया करती थी! उसने छोटी आयु में ही ज्ञान- दीक्षा प्राप्त कर ली थी और नियमित साधना भी करती थी! एक समय आया, जब उसका विवाह श्रावस्ती के सेठ मिगार के पुत्र पुण्यवर्धन के साथ तय हो गया! इस प्रस्ताव से वह केवल इसलिए  प्रसन्न थी, क्योंंकि महाबुद्ध प्राय: श्रावस्ती आया करते थे! पर विवाह करके जब वह ससुराल आई तो उसे पता चला कि उसके श्वसुर किसी अन्य सम्प्रदाय को मानते हैं और बुद्ध में उनका तनिक भी विश्वास नहीं है! पर विशाखा एक   दृढ़ साधिका थी! ससुराल में भी वह हर प्रातःगुरु चरणों का स्मरण करते हुए ध्यान साधना के साथ अपने दिन  का आरंभ करती! साथ ही अपने सभी उत्तरदायित्वों का भी कुशलता से निर्वाह करती!एक दिन उसके श्वसुर मिगार सोने-चांदी के बर्तनों में ताजा भोजन कर रहे थे!तभी द्वार पर भिक्षाटन के लिए एक बौद्ध भिक्षु आया! विशाखा के मन में भिक्षु को कुछ देने की बड़ी तीव्र इच्छा हुई! लेकिन  ससुर की अनुमति के बिना कुछ दे भी नहीं सकती थी!वैसे तो मिगार सब प्रकार से संपन्न थे, पर वह किसी भी प्रकार के दान में विश्वास नहीं रखते थे!विशाखा के लिए बड़े अंतर्द्वंद की स्थिति थी! वह सुमिरन से जुड़ गई! उसके भीतर से एक विवेक वाणी निकली! उसने भिक्षु से कहा, कृपया आप आगे जाइए! हम तो बासी भोजन  करते हैं! जैसे ही मिगार ने पुत्रवधू की यह बात सुनी तो उसे बहुत क्रोध आया! उसने उसे घर से निष्कासित करने के लिए पंचायत बुला ली!पंचायत ने जब विशाखा से इसका कारण पूछा तो उसने कहा- आदरणीय पचों! शास्त्रों के अनुसार इस जन्म में यदि हम धनी हैं, तो यह  हमारे पूर्व जन्मों के दान का प्रतिफल है!पुराने पुण्यों के कारण ही मेरे ससुर जी को आज इतना सुख भोग प्राप्त है! वे सोने-चांदी के बर्तनों में श्रेष्ठ व्यंजन खाते हैं! सो इसलिए मैंने भिक्षु से कहा था कि वे बासी भोजन खा  रहे हैं, मतलब कि पूर्व जन्मों के पुराने पुण्यों के प्रताप से सुख भोग रहे हैं!तत्व की दृष्टि से यह वचन सत्य ही था!

पंचों और मिगार ने जब विशाखा की यह बात सुनी तो हैरान रह गए! बात बिल्कुल सही थी! मिगार के मन से विशाखा के प्रति सारा द्वेष जाता रहा! उसने अपने आप को सौभाग्यशाली माना कि ऐसी विवेकवती पुत्रवधू प्राप्त हुई! उसने विशाखा को धर्ममाता कहकर पुकारा! तभी से महाबुद्ध की शिष्या विशाखा का एक और नाम विख्यात हुआ मिगारमाता! अपनी पुत्रवधू के दिव्य आचरण से प्रभावित होकर मिगार ने भी भगवान् बुद्ध से दीक्षा प्राप्त की! इस तरह विशाखा ने अपने और अपने ससुर के लिए वर्तमान जन्म में ताजे पुण्य संस्कारों का अर्जन किया!

**ओम् श्री आशुतोषाय नम**

"श्री रमेश जी"

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