भगवान् की इस गुण-दोषपूर्ण सृष्टि में मानव -शरीर स्वर्गिक द्वार और सर्वोत्तम रचना है। काल, स्वभाव और कर्म की प्रबलता के कारण अच्छे-बुरे लोग माया/ अज्ञान/अवि़द्या/मोह के कारण कभी -कभी अच्छाई से चूक जाते हैं और बुरा कर देते हैं। अच्छे लोग अपनी चूक/ कमी को सुधार लेते हैं और निर्मल यशस्वी बनते हैं, वैसे ही बुरे/दुष्ट भी कभी-कभी अच्छा संग पाकर अच्छा करते हैं, लेकिन बुरे/दुष्ट व्यक्ति की बुराई/दुष्टता नहीं मिटती।उनका दुष्ट स्वभाव तो बना ही रहता है।जो वेषधारी ठग हैं वे अपने वेष के प्रताप से संसार/समाज द्वारा पूछे जाते हैं, परंतु एक न एक दिन उनकी असलियत सबके सामने प्रकट हो जाती है और उनका पतन हो जाता है। महात्मा तुलसी दास जी ने अपने महाकाव्य “रामचरितमानस” में ठीक ही कहा है –
लखि सुवेष जग बंचक जेऊ।
वेष प्रताप पूजिअहिं तेऊ।।
उघरहिं अंत न होई निबाहू।
काल नेमि जिमि रावन राहू।।–
बालकांड ,३
प्रस्तोता
डां०हनुमान प्रसाद चौबे
गोरखपुर।
