सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।
संसार में प्रायः यह देखा जाता है कि एक सामान्य इंसान भोजन में विष होने के संदेह मात्र से ही भोजन खाने का त्याग कर देता है। जबकि संसार के सभी विषयों में विष ही विष भरा पड़ा है, ऐसा सभी जानते हैं और मानते भी हैं। लेकिन फिर भी आम साधारण मनुष्य इन्हें चखने से बाज नहीं आता। इसपर बार बार चिंतन करें, तभी एक दिन वैराग्य का बीज अंकुरित होगा।
मनुष्य योनि में किया गया प्रत्येक कर्म या क्रिया मनुष्य के मन पर भी कुछ न कुछ छाप अवश्य ही छोड़ता है। फिर एक ही प्रकार का कर्म बार बार होने से छाप और अधिक गहरी होती जाती है, जो एक स्वभाव को जन्म देती है। मनुष्य योनि मे ही हमारा स्वभाव + - होता है। फिर स्वभाव बनने पर 90% कर्म सहज ही होने लगते हैं, अर्थात कर्म करने नहीं पड़ते।
नींद में देखे गए सभी सपने सदा ही सच लगते हैं। लेकिन नींद से जागते ही सपने झूठे लगते हैं। जबकि मिला हुआ जीवन हम सबको जागृत अवस्था मे सच ही लगता है। लेकिन गहरे चिंतन के बाद आप महसूस करेंगे कि मृत्यु रूपी नींद में जाने पर बीता हुआ जीवन भी एक सपना ही लगेगा।
**ओम् श्री आशुतोषाय नम:**
"श्री रमेश जी"
