सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।
प्रकृति के सतो+रजो+तमोगुण नित्य होने के बावजूद भी जड़ है। प्रकृति के नियमों के अनुसार सभी पदार्थों का अंतिम परिवर्तन नाश होना ही है। फिर भी मनुष्य इन्हीं नाशवान पदार्थों के लिए कर्म ही नहीं, विकर्म /पाप भी करता रहता है। दूसरी ओर मिले हुए पदार्थों का सीमा से अधिक भोग करने में हम सभी की इंद्रियां सदा ही असमर्थ होती हैं। इसलिए भाग्य से भी मिले हुए अतिरिक्त पदार्थों को अवश्य ही जरूरत मंद लोगों में बांटते रहना चाहिए।
भौतिक प्रकृति के सभी जीवों के शरीरों की आवश्यकताएं होती हैं। जबकि मनुष्य जन्म में हम अपने जीवन में भोग प्रेरित इच्छाएं पाल लेते हैं, जिनको बढ़ाने से अंततः हमारे दुख ही बढ़ते हैं। जबकि आध्यात्मिक इच्छा, यानि प्रभु को पाने की इच्छा रखने मात्र से प्रारंभ से ही सुख बढ़ने लगते हैं। फिर भी मनुष्य अपने जीवन में फैसला करने में गलती क्यों कर जाता है? इस पर हम सबको विचार करना चाहिए।
84 लाख योनियों के सभी असंख्य जीवों के सभी स्थूल शरीर कच्चे घड़े के समान है, जो कभी भी टूट सकते हैं। केवल मनुष्य योनि में ही हम आध्यात्मिक उन्नति करते करते परमात्मा को पा सकते हैं। इसलिए इस स्थूल शरीर का सदुपयोग करते हुए हमें जीवन में किसी ब्रह्मनिष्ठ सद्गुरु से ब्रह्मज्ञान प्राप्त कर सदा ही ध्यान साधना सेवा व सत्संग करते रहना चाहिए। क्योंकि ध्यान साधना करने से ही हमारा सूक्ष्म और कारण शरीर पवित्र होता है।
**ओम् श्री आशुतोषाय नम:**
"श्री रमेश जी"
