सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।
"शरीरमाद्यं खलुधर्म साधनम्"
अर्थात मानव तन माध्यम है, धर्म को साधने का। इस मानव तन के द्वारा ही धर्म की प्राप्ति संभव है। धर्म का सम्बन्ध केवल बाह्य लक्षणों से नहीं है। केवल बाह्य कर्मों द्वारा यदि हम कहें कि हम धर्म के मार्ग पर चल रहे हैं तो यह सत्य नहीं है। धर्म का प्रारंभ ही अनुभव से होता है। जब हम ईश्वरीय सत्ता की झलक अपने में ही पा लेते हैं, तब हम धर्म के लक्षणों को धारण करते हुए, जीवन में सुख, शांति एवं समृद्धि की प्राप्ति करते हैं और जीवन में ही दिव्य शक्ति को जान कर स्वयं का परम कल्याण कर लेते हैं।
**ओम् श्री आशुतोषाय नम:**
"श्री रमेश जी"
