सर्व श्री आशुतोष महाराज जी की कृपा वर्षा
जल और मन दोनों की गति एक समान है। जैसे जल स्वत: नीचे की ओर बहता है। यही हाल मन का भी है। वह भी संसार के तुच्छ विषयों की ओर ही दौड़ता । मन को बस में करना वायु को वश में करने का सामान दुष्कर है। इसलिए अर्जुन ने श्री कृष्ण भगवान के समक्ष समस्या रखी- *चंचलमं ही मन:*.... प्रभु मन बहुत चंचल है इसे कैसे वश मे करूं?'श्री कृष्ण ने उत्तर दिया - 'हे पार्थ! निश्चय ही मन को बस में करना कठिन है। लेकिन असंभव नहीं है। मन को अभ्यास और वैराग्य से बस में किया जा सकता है।- *अभ्यासेन तू कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते*।
'विचरणीय बात यह है कि बैराग किससे करना है और अभ्यास किसका करना है! महापुरुष बैराग के बारे में कहते हैं -जो वस्तुएं नश्वर है, ऐसे पदार्थ से वैराग्य करना है। फिर अभ्यास के बारे में कहते हैं की ध्यान का अभ्यास करना चाहिए। अब ध्यान का अभ्यास कैसे करें? ध्येय के बिना ध्यान कैसा?
ध्यान के शास्त्रों में दो प्रकार का बताया गया है-स्थूल और सूक्ष्म। मूर्ति स्वरूप आदि का चिंतन 'स्थुल'और हृदय में प्रज्वलित ज्योति, प्रकाश आदि का दर्शन 'सूक्ष्म' ध्यान है। स्थूल ध्यान से मन को बस में नहीं किया जा सकता। सूक्ष्म ध्यान से, उस परमात्मा तत्व से मन को शीघ्र ठहराया जा सकता है।
अतः आवश्यकता परम तत्व की प्राप्ति की है। इसलिए महापुरुष जब -जब इस धरा पर आए, उन्होंने परमात्मा को तत्व रूप से जानने का मार्ग दिखाया। जब हम एक पूर्ण गुरु की कृपा से इस तत्व रूप अर्थात दिव्य प्रकाश को देखते हैं तो ध्यान लगता है।
ॐ श्री आशुतोषाय नमः
श्री सियाबिहारी जी ✍️
