सोचता हूं

 

मनुष्य को अपना मकान बनाने केलिए 

मिस्त्री,लेबर्स,ईंट,बालू, सीमेंट्स,छड़ आदि का प्रबंध करना पड़ता है और तब उसे रहने के लिए बना मकान मिलता है।

पशु-पक्षी तो पेड़ों, कंदराओं आदि में जाड़ा, गर्मी और वर्षा व्यतीत करते हैं।

लेकिन पक्षियों में एक वया पक्षी होता है जो अपने रहने केलिए अपना घोंसला बनाने में कुशल होता है परंतु उसे भी अपने घोंसले बनाने केलिए लेबर्स के अतिरिक्त तिनकों आदि की आवश्यकता होती ही है।

कीटों में एक ऐसा कीट होता है जो अपना निवास तैयार करने में न मिस्त्री की आवश्यकता होती है और न लेबर्स, ईंट, बालू, तिनकों आदि की। वह  जब चाहता है खुद, खुद से बनाता है औरखुद हीनष्टकरनेमेंसक्षम भी होता है। उसे कहते हैं –मकडी/लूता/ऊर्णनाभ/ तंतुनाभ

आदि।

मकड़ी -आवास/जाल के समान ही यह सृष्टि/संसार भी है। आदि कारण/आदि शक्ति/परमब्रह्म/परमात्मा/भगवान्/आत्मा ने विचार किया -”एक हूं। अनेक हों जाऊं।” उसने अपने को दो रूपों में व्यक्त किया और सृष्टि/संसार की रचना की–

१-जड़ शरीर /भोगायतन–आत्मा से  आकाश,आकाश से वायु , वायु से अग्नि, अग्नि से जल तथा जल से पृथ्वी उत्पन्न हुई ‌। इस पंचमहाभूत निर्मित जड़ शरीर में आत्मा ने चेतन जीवात्मा रुप में प्रवेश किया।

२-चेतन शरीरी-जीवात्मा, भोक्ता ,क्षेत्रज्ञ परा प्रकृति आदि।

स ऐक्षत,एको अस्मि,बहुस्याम।आत्मन: आकाश:संभूत– - -पृथिवी अभूत्।तं सृष्ट्वा तदनुप्राविशत्- —। मकड़ी के  जाल के समान अव्यक्त आत्मा भी संसार के रुप में स्वयं ही व्यक्त होता है अर्थात्

अव्यक्त आत्मा हीव्यक्त संसार है।

                 प्रस्तुतकर्ता

      डाक्टर हनुमान प्रसाद चौबे 

                  गोरखपुर

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