*भक्ति मुक्ति का साधन है साधना!*

      सर्व श्री आशुतोष महाराज जी की कृपा वर्षा

यदि आपकी धर्म- ग्रंथो में आस्था है,तो उनमें  वर्णित अवतारी महापुरुषों की घोषणाओं पर अवश्य मनन करें...

•भगवान श्री कृष्ण अर्जुन से साधना के विषय में स्पष्ट कहते हैं-एक साधक शुद्ध तथा एकांत स्थान ढूंढ कर, वहां आसान बिछाकर ध्यान मुद्रा में बैठे। चीत और इंद्रियों की क्रियाओ को बस में रखते हुए मन को एकाग्र करें‌ इसके लिए अपने शरीर, सिर और गर्दन को बिल्कुल स्थिर और अचल रखें; इधर-उधर हिलाये - डुलाये बिना! साथ ही, अपनी दृष्टि को भृकुटी पर केंद्रित करते हुए, अन्य दिशाओं में ना देखते हुए, शांत व भयरहित अंतःकरण वाला बने। एकमात्र अपने इष्ट का स्मरण करते रहें। इस प्रकार करते रहने से ध्यान आज्ञा- चक्र में स्थित हो जाता है, जहां साधक को परम ज्योति स्वरूप परमात्मा के दिव्य दर्शन होते हैं। अतः उसका मन पूर्ण शांति व आनंद का अनुभव करता है। 

•भगवान शिव मां पार्वती को साधना का महत्व बताते हुए शिव संहिता में कहते हैं-      *एतत् ध्यानस्य महात्म्यं माया वक्तुं न शक्यते।* 

*य: साध्यति जानाति सोऽस्माकमपि सम्मतम्।।*

अर्थात है प्रिय! इस ज्ञान का महात्म्य इतना है कि मैं भी उसे पूरी तरह कहने में स्वयं को असमर्थ जान रहा हूं। जो साधना करता है, वही इसे जान सकता है। 

तो आइए, भगवान की इन आज्ञाओं को शिरोधार्य कर हम सभी साधक प्राणपन से साधना करने का संकल्प धारण करें। 

ॐ श्री आशुतोषाय नमः 

श्री सियाबिहारी जी ✍️

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