*मनुष्य दृढ़ संकल्पित होकर अपने भाग्य को पलट सकता है!*

            सर्व श्री आशुतोष महाराज जी की कृपा वर्षा

अपने भाग्य को बदल देना, मनुष्य के लिए संभव है। क्योंकि मनुष्य- जीवन केवल भोगयोनि नहीं, कर्मयोनि भी है। मनुष्य में नए कर्म द्वारा अपने पुराने भाग्य को बदल देने का सामर्थ्य है। इस तथ्य को वैज्ञानिक न्यूटन का दूसरा नियम बहुत सटीक समझता है- 'An object at rest stays  at rest and an object in mation stays in mason with the same speed and in the same direction unless an external force is applied to it'. यानी एक जड़ वास्तु तब तक जड़ रहती है और एक गतिशील वस्तु तब तक गतिशील रहती है, जब तक उस वस्तु पर बाहरी बल ना लगाया जाए। बल लगाकर अपनी स्थिति को बदल लेना, किसी अन्य जीव योनि के अधिकार में नहीं है। यह अधिकार केवल मनुष्य को ही प्राप्त है। परंतु विडम्बना है कि हम अपने अधिकार का प्रयोग नहीं करते। भाग्य के हाथ का खिलौना बन अपने नसीब को कोसते रहते हैं। और यदि प्रयोग भी करते हैं, तो दिशा गलत चुन लेते हैं। मन को केंद्र में रखकर कर्म करते हैं। इस कारण कर्म- बंधनों की एक नई श्रृंखला शुरू कर देते हैं। 

इसलिए हमें सही दिशा में सही कर्म करने की आवश्यकता है। यह सही दिशा  हमें एक जागृत आत्मा से ही प्राप्त हो सकती है। एक सद्गुरु द्वारा जब हम ब्रह्मज्ञान की दीक्षा लेते हैं, तो वे हमारी सुषुप्त आत्मा को जागृत करते हैं। तत्पश्चात हमारा विवेक भी जाग्रत होता है। सही गलत का निर्णय करने का समर्थ हमारे भीतर आता है। तब हमारा प्रत्येक कर्म सही दिशा में क्रियान्वित होता है। फल स्वरुप हमारे कर्म बंधन नहीं , मोक्ष का कारण बनते हैं। हमारे खाते में जो संचित कर्म है, वे एक-एक करके समाप्त हो जाते हैं और जीवात्मा मुक्ति के पथ पर अग्रसर होती जाती है। 

ॐ श्री आशुतोषाय नमः 

श्री सियाबिहारी जी ✍️

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