सोचता हूं

“मैं “अविनाशी,चेतन ,आनंद आत्मा हूं या

प्रतिक्षण नष्ट होने वाला, जड़, सुख-दु:ख,

पंचतत्त्व निर्मित यह स्थूल शरीर?

हमारी भारतीय प्राचीनतम विश्व कल्याण मयी और त्यागमयी संस्कृति में जगत्

केआदिकारण का स्वरुप मन तथा वाणी  के परे है,परंतुव्यावहारिकसुविधा केलिए 

हमारे ऋषि -मुनियों ने सृष्टि के परम कारण का निरुपण दो तरह से किया -

१-पुरुष रुप से –आदि पुरुष, भगवान् , ईश्वर,ब्रह्म आदि‌‌। तथा

२-स्त्री रुप से –आदि शक्ति,भगवती आदि।

भगवान् को निरुपित किया गया -

सत्य, शिव(कल्याण), सुन्दर,चिद्, आनंद,

सनातन, नित्य,अज,अव्यक्त, अव्यय ,चेतन,अमल, अचिंत्य आदि।

भगवान् की प्रकृति दो तरह की है –

१-परा प्रकृति(चेतन, प्रकृति )तथा 

२-अपरा प्रकृति(अचेतन याजडप्रकृति)।

१-परा प्रकृति (चेतन प्रकृति)–इसे ईश्वरांश, जीव,शरीरी, आत्मा, क्षेत्रज्ञ, अक्षर पुरुष, जीवात्मा आदि कहते हैं।इस

जीवात्मा के गुण हैं –

सत्य,चिद्, आनंद, सौंदर्य, पवित्रताआदि।

२-अपरा प्रकृति (अचेतन प्रकृति)-इसेजड

, क्षेत्र,शरीर,क्षरपुरुष आदि कहते हैं।

क्षिति,जल, पावक,समीरतथागगन पंचमहाभूत और मन, बुद्धि तथा अंहकार -ये आठ जड प्रकृति है। इसके गुण हैं -

इच्छाद्वेष:सुखं दु:खंस़ंघातचेतनाधृति:।

एतत्क्षेत्रंसमासेन सविकारमुदाहृतम्।।-

गीता अध्याय १३,श्लोक ६ अर्थात् क्षेत्र (शरीर) के गुण संक्षेप में हैं–

इच्छा,क्रोध,झूठ,चोरी,लालच,मोह,द्वेष ,दु:ख, स्थूल शरीर, और अंत:करणकी एक तरह की चेतनाऔर धैर्य।ं

इस तरह चेतन आत्मा और जड़ शरीर के गुणों में काफी अंतर है।एक के गुण नित्य हैं और दूसरे के गुण नश्वर।

उपनिषदें घोषणा करती हैं–

जीवो ब्रह्मैव नापर:--यह जीव ब्रह्म ही है, अन्य नहीं।

अयमात्मा ब्रह्म –यह आत्मा ब्रह्म है।

तत्त्वमसि–वह(ब्रह्म) तुम(जीव)हो।

ब्रह्मविदाप्नोति परम्–ब्रह्म को जाननेवाला परब्रह्म को प्राप्त कर लेता है। आदि।

ऐसी दशा में यह विचारणीय है कि हम 

 सनातन स्वगुणी(आत्मा के गुण वाले) हैं अथवा प्रति क्षण नष्ट होनेवालेपरगुणी( शरीर के गुण वाले) ? अर्थात् “मैं”इस शरीर को सदा देखने वाला आत्मा है या

लगातार नष्ट होने वाला यह जड़ शरीर!

            प्रस्तुतकर्ता 

     डां.हनुमान प्रसाद चौबे 

             गोरखपुर।

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