**शुभ्रता के महापुंज के समक्ष निकृष्टता अपना अस्तित्व खो बैठती है।**

 सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।

हमारे भीतर ही अच्छाइयाँ बुराइयाँ होते हैं। अच्छाई सदगुणों को, सदाचार को दर्शाता है। वहीं बुराई विषय वासनाओं, दुर्गुणों का प्रतीक है। हम इन अच्छी और बुरी प्रवृत्तियों के बीच झूलते रहते हैं। कभी हम पर विषय विकार हावी हो जाते हैं; तो कभी हम सदगुणों के प्रभाव में कार्य करते हैं। इस रस्साकशी में हमारे दुर्गुण,  अक्सर अपने बल से हमें निचे धकेलने में सफल हो जाते हैं। इन्हें वश में न कर पाने के कारण हम खुद को बहुत असहाय महसूस करते हैं। तब इन लम्हों में हम सद्गुणों की विभूतियों से प्रभावित होते हैं। उनसे प्रेरणा पाकर हम बुराई की लगाम को कसकर खींचने का प्रयास करते हैं। अनुशासन की लगाम पर अपनी मजबूत पकड़ बनाकर रखने का संकल्प लेते हैं। इस तरह बहुत कोशिश करके हम ऊपर की ओर यानि अच्छाई की ओर बढ़ने लगते हैं।

   परन्तु कुछ समय बाद हम कई बार नेकी, अच्छाई के मार्ग पर अनुशासित जीवन जीते जीते थक जाते हैं और हम गिर जाते हैं। किसी न किसी रूप में हम पर हावी हो जाता है। ही इस तथ्य के हम सभी साक्षी या अनुभवी होंगे। नेक लोग पथभ्रष्ट हो गए।

   तो फिर समाधान क्या है?

हमसे भूल हुई। उस स्थान पर नहीं रुके, जहाँ से दिव्य प्रकाश का सोता फूट रहा था। भूल ने सारी समस्या पैदा की। दरअसल, यह प्रकाश का सोता संकेत है, ईश्वर के तत्व रूप का। गुरु का दरबार वह स्थान होता है, जहाँ से हम ब्रह्मज्ञान को पाकर अपने अंतर्जगत में ईश्वर के तत्व रूप का दर्शन कर सकते हैं।फिर ध्यान साधना द्वारा हमारा मन उस दिव्य प्रकाश में स्नान कर पाता है। तब ईश्वर के प्रखर तेज व ओजस्विता के आगे, दुर्गुण धूमिल पड़ने लगते हैं। शुभ्रता  के  महापुंज के समक्ष निकृष्टता अपना अस्तित्व खो बैठती है।

   इसलिए यह धारणा कि मात्र अच्छाई के रास्ते पर चलना ही पर्याप्त है- सही नहीं है। बल्कि सच्चाई तो यह है कि जब ब्रह्मज्ञान द्वारा दिव्य प्रकाश पर नित्य ध्यान लगाया जाता है, तब ही हम अच्छाई के मार्ग पर दृढ़ता से चल पाते हैं। बार बार बुराई या निकृष्टता की ओर नहीं फिसलते।

**ओम् श्री आशुतोषाय नमः**

"श्री रमेश जी"

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