सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।
"श्री रमेश जी"जीवन एक वृक्ष है।संस्कार इसमें दिया जानेवाला खादपानी और आचरण इसका फल है।
जीवन रुपी इस वृक्ष में संस्कार रुपी खादपानी का जितना सुन्दरतम सिंचन किया जाएगा, आचरण रूपी फल भी उतना ही मधुरतम और श्रेष्ठतम होगा।
हरियाली अवश्य किसी वृक्षका सौंदर्य है, लेकिन फल उसकी सार्थकता है। जिस प्रकार फल वृक्ष की उपयोगिता को बढ़ा देते हैं, ऐसे ही हमारा आचरण ही संसार में हमारी उपयोगिता का निर्धारण करता है।
फल जितना सुस्वादु व मधुर होगा, वृक्ष की उपयोगिता भी उतनी ही अधिक होगी। ठीक ऐसे ही हमारा आचरण भी जितना मधुर व श्रेष्ठ होगा, समाज में हमारी उपयोगिता भी उतनी ही अधिक होगी।
भौतिक प्रकृति के 84 लाख योनियों में असंख्य जीव हैं। इन सभी जीवों के 3 शरीर होते हैं। स्थूल, सूक्ष्म व कारण शरीर। हम सभी मनुष्यों के स्थूल शरीर यानि तन हर वक्त बूढ़े होते जाते हैं और एक दिन समाप्त भी हो जाते हैं। यही प्रकृति का एक नियम है। जबकि हमारे सूक्ष्म शरीर यानि मन में भोगों की कामनाएं सदा ही जवान बनी रहती है। फिर तन के मरने के बाद, सूक्ष्म शरीर में यही अधूरी कामनाएं + कारण शरीर में बना हुआ संस्कार अगले नए जन्म का आधार बनता है।
आज साधारण मनुष्य के जीवन में आहार, मैथुन, निद्रा आदि भोगों को अधिक से अधिक भोगने का ही लक्ष्य बना रहता है। और इन्हीं के छिन जाने का भय मन में सदा ही बना रहता है। यदि हमारे जीवन की सारी भाग दौड़ इसी दिशा में ही बनी हुई है, तो पशु पक्षियों व मनुष्य का अन्तर ही समाप्त हो जाता है। ऐसे में मनुष्य के मरने के बाद हमारा अगला जन्म मनुष्य योनि में मिलने की संभावनाएँ कमजोर होने लगती हैं। जबकि मनुष्य योनि में ही ब्रह्मज्ञान प्राप्त कर ध्यान साधना व सत्संग करने का एक अवसर है।
अत: हम सभी मनुष्यों को यह अवसर नहीं खोना चाहिए....।
**ओम् श्री आशुतोषाय नम:**
"श्री रमेश जी"
