सर्व श्री आशुतोष महाराज जी की कृपा वर्षा
संसार की कंपनी या बिजनेस के नाम में अक्सर लिखा जाता है-प्राइवेट लिमिटेड या पब्लिक लिमिटेड। मतलब सबके साथ 'लिमिटेड'(सीमित) शब्द जोड़ दिया जाता है। सिर्फ कंपनियां ही क्यों? आप संसार के समस्त रिश्ते- नातो, संबंधों को देख ले सबका दायरा सीमित है, लिमिटेड है। लेकिन अध्यात्म जगत में ऐसा नहीं है। क्योंकि गुरु की कंपनी (संगति) ऐसी होती है, जो हर प्रकार से असीम हुआ करती है। उनके कार्य क्षेत्र का दायरा असीम है।वे न केवल हमारे आत्मिक उत्थान में सहयोग देते हैं, बल्कि सांसारिक उपलब्धियां को हासिल करने में भी पग- पग पर अपना मार्गदर्शन प्रदान करते हैं। उनका प्रेम, शिष्यों के प्रति उनका समर्पण-सब कुछ असीम होता है। उनके संबंध में सभी सीमाओं का अस्तित्व पूर्ण रूप से समाप्त हो जाता है माने उनकी कंपनी लिमिटेड नहीं अनलिमिटेड (असीम) है। इसलिए शिष्य को साधना- सुमिरन के द्वारा उस(पूर्ण गुरु) स्त्रोत के संग सदा जुड़े रहना चाहिए।
ॐ श्री आशुतोषाय नमः
श्री सियाबिहारी जी ✍️
