सर्व श्री आशुतोष महाराज जी की कृपा वर्षा

एक ब्रह्मज्ञानी साधक को हमेशा सुमिरन से जुड़े रहना चाहिए। जैसे-जब हम अपने पालतू कुत्ते को नहलाते हैं, बहुत अच्छे से साबुन लगाकर उसे साफ करते हैं। पर अगर नहलाने -धुलाने के बाद हम उसे नहीं बांधते हैं, तो वह क्या करता है? वापस मिट्टी में जाकर, उसमें लोट -पोट होकर अपने को गंदा कर लेता है।
इस मन का भी यही कहानी है। ध्यान -साधना से मन की मालीनता धुलती है। अवांछित चिंतन, ऊलजुलूल विचारों और नकारात्मक भावनाओं की गंदगी साफ होती है। मन स्वच्छ और उजाला बन जाता है। साधना के बाद किसी धुले हुए, साफ मन को सुमिरन की चेन से बांधकर रखना बहुत जरूरी है। नहीं तो, यह भी इधर-उधर भाग कर फिर से नकारात्मकता की धूल मिट्टी खुद पर चढ़ा लेता है।
इसलिए जो ब्रह्मज्ञानी शिष्य हैं उन्हें तत्पर होकर के ध्यान साधना करना चाहिए।
ॐ श्री आशुतोषाय नमः
श्री सियाबिहारी जी ✍️