सर्व श्री आशुतोष महाराज जी की कृपा वर्षा
सांसारिक जीवन में एक इंसान खुद को रिश्ते के लिए न्यौछावर कर देता है। जीवन भर खुद को खोकर उनके लिए जीता है। कह सकते हैं कि अपनी हस्ती को उनमे विलय कर देता है। पर बदले में क्या पता है? अक्सर तो अपमान, धोखा और तिरस्कार! स्वार्थ भरा व्यवहार! और अगर मान लीजिए, संसार में कही सच्चा प्यार मिल भी जाए... तो भी अंततोगत्वा, खुद को खोकर भी, रहता तो वो इंसान का इंसान ही है न ।
लेकिन आगे, हम आपको बताते हैं, वास्तविक प्रेम की पराकाष्टा । अपने अस्तित्व को विलय, अपनी हस्ती को मिटाकर खाक करने की यह प्रक्रिया अध्यात्म जगत में भी घटती है। यहां एक शिष्य विगलित करता है अपनी मैं,अंह, अस्तित्व का कण -कण अपने गुरु के श्री चरणों में। पर उसके इस खोने मे भी पाना है। ऐसा 'पाना' जो उसके पूर्व रूप से भी श्रेष्ठतर है। शिष्य स्वयं को विलय करके प्राप्त करता है-गुरु की दिव्यता को। गुरु उससे उसकी 'मै' को लेकर उसे अपना ही रूप प्रदान कर देते हैं। इसे ही तो संत कबीर ने कहा - *गुरु कर ले आप सामान*।
ॐ श्री आशुतोषाय नमः
श्री सियाबिहारी जी ✍️
