सर्व श्री आशुतोष महाराजजी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।
भौतिक जगत में ऐसे बहुत से लोग हैं, जिन की दुनिया में आज भी परमात्मा नहीं के बराबर है। जबकि परमात्मा की सत्ता इस भौतिक प्रकृति के कण-कण में विद्यमान है। फिर ऐसे लोगों को समय समय पर प्रकृति द्वारा मिलने वाले दुखों की चोट परमात्मा की याद सहज ही करवा देती है। हालांकि सभी जीव मनुष्य योनि में ही किये गये सभी पाप-पुण्य कर्मों का ही दुख-सुख रूपी फल भोगते हैं। फिर भी परमात्मा परम दयालु हैं और अन्ततः सभी जीवों से प्रेम करते हुए उनके दुख दूर करते हैं।
मन में भोग विषयों का निरंतर चिंतन होते रहने से ही कामना पैदा होती है। मनुष्य की सभी कामनाएं कभी पूरी नहीं होती। जो पूरी हो जाती हैं, उनसे पहले तो मोह हो जाता है व बाद में लोभ जाग जाता है। और फिर कामना की पूर्ति में बाधा डालने वाले पर क्रोध आने लगता है। उसके बाद हमारी बुद्धि में इंसानियत समाप्त हो हैवानियत आ जाती है। जिसके रहते अक्सर पाप कर्म ही होते हैं, जो भविष्य में हमारे दुख का कारण बनते हैं। इसलिए आरंभ से ही अनैतिक भोग प्रेरित कामनाओं से बचकर रहना चाहिए।
**ओम् श्री आशुतोषाय नम:**
"श्री रमेश जी*
