*राधे राधे जपो चले आएंगे बिहारी*!!

           सर्व श्री आशुतोष महाराज जी की कृपा वर्षा

कृष्ण भगवान है और राधा भक्ति स्वरूपा है। इसलिए कह सकते हैं जैसी भक्ति भावना होगी, उसी रूप में भगवान भक्त के सामने प्रगट हो जाते हैं। क्योंकि भगवान वैसे ही दिखते हैं,-गोस्वामी तुलसीदास जी रामचरितमानस में लिखते हैं 

*जिन्ह  के रही भावना जैसी। प्रभु मूरत तिन्ह देखी तैसी।*

प्रेम -नगर का यही निराला विधान है। पहले रोम -रोम में, अंतर्घट  में भक्ति को बसाना होता है। आंखों में ध्यान का प्रकाश भरना होता है। कानों में प्रभु महिमा का अनहद नाद... और श्वासों मे नाम की सुरभि! चिंतन- स्मरण आरधन करते-करते, भक्ति  साधक के रोम-रोम में बस जाती है। और फिर भक्ति के जितने-जितने रंग भक्त के ऊपर चढ़ जाते हैं, उतने -उतने प्रखर श्रृंगार मैं भगवान उसे प्रकट दिखने लगते हैं। जो हम बोलचाल की भाषा में गा देते हैं न-    *'राधे राधे जपो, चले आएंगे बिहारी'* -   

        इसका तात्विक अर्थ यही है-'ब्रह्मज्ञान की साधना से पोषित भक्ति करो। भगवान स्वयं आन मिलेंगे'। पहले भक्ति का आगमन फिर भगवान के पूर्ण दर्शन व मिलन!

ॐ श्री आशुतोषाय नमः 

श्री सियाबिहारी जी ✍️

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