सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।
गीता में लिखा है _
"सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति"
अर्थात जिसने मुझे अपना 'सुहृद' जान लिया, उसे इतना जानने भर से ही शांति मिल जाती है।
यही सूत्र है। गागर में सागर जैसा। हममें से जिन साधक शिष्यों ने इस सूत्र को जीया है, श्री महाराज जी को अपना 'सुहृद' (परम मित्र) जाना है- उसका जीवन तृप्त होकर कहता है कि अब उनके लिए कुछ भी पाना शेष नहीं रहा है। एक कवि की कलम ने कभी कहा था-
.. खोजो एक ऐसे सम्बन्ध को, जो अपने अधूरेपन और कमजोरियों की सीमा में न बंधा हो.. बल्कि अपने असीमित सामर्थ्य से तुम्हारे सीमित दायरों को तोड़ दे।
खोजो एक ऐसे सम्बन्ध को, जो अपने मन की क्षुद्र भावनाओं का दास न हो.. बल्कि तुम्हें विराटता के गगन में उन्मुक्त उड़ान भरना सिखा दे।
खोजो एक ऐसे सम्बन्ध को, जो कल परसों की गलतियों को न देखे; तुम्हारी आज की कोशिशों को देखे।.. सिर्फ सफलताओं पर नजर न रखे; हर कर्म के पीछे तुम्हारी भावनाओं की भी कद्र करे।
खोजो एक ऐसे सम्बन्ध को, जिसे तुम्हें बार बार अपने आपको समझाना न पड़े; बल्कि जो तुम्हें तुमसे ज्यादा समझता हो। जो तुमसे ज्यादा तुम्हारा हो।..
अंत में कवि कहता है _
.. यदि जन्मों के तप के बाद ऐसा कोई तुम्हें मिल जाए, तो घुटनों के बल गिर जाना और अपने आप को उसे पूरा का पूरा दे देना। क्योंकि तुम जिन्दगी से इससे ज्यादा कुछ और नहीं माँग सकते।।
नि:संदेह, हमारी खोज पूरी हुई.. जिन्दगी ने हमें सबकुछ दे दिया- जब श्री आशुतोष महाराज जी हमें गुरुदेव के रूप में मिले। पर हाँ, अभी भी एक सवाल सुलझना बाकी है। कहीं ऐसा तो नहीं, हमें शिष्य रूप में पाकर श्री महाराज जी की खोज अभी भी अधूरी रह गई हो? जरा सोचें, अगर कवि की कलम गुरु महाराज जी के लिए कविता लिखती, तो उनसे क्या आग्रह करती?
... खोजिए एक ऐसे शिष्य को, जो श्वास श्वास आपके आदर्शों के लिए जीए और आपके आदर्शों के लिए ही मृत्यु को भी स्वीकार करे।
खोजिए एक ऐसे शिष्य को, जिसके माध्यम से इस संसार में आपका ज्ञान जी उठे, आपका सत्य जी उठे- आप स्वयं जीवंत और व्यक्त हो सकें।...
पाठकगण। आप समझें कि पूर्ण गुरु या सद्गुरु का दिव्य सम्बन्ध कैसा होता है? दूसरी ओर जानेंगे कि एक शिष्य का शिष्यत्व या साधक की साधना कैसे अपने पूर्ण गुरु की खोज को पूर्ण करती है।
**ओम् श्री आशुतोषाय नम:**
"श्री रमेश जी"
