सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।
रामकृष्ण परमहंस के दो शिष्य इसी बात पर परस्पर उलझ पड़े की उनमें से कौन वरिष्ठ है। विवाद तय न होने पर गुरुदेव के पास जाकर उन्होने पूछा- गुरुदेव! हम दोनो में से कौन बड़ा है? बस इतनी- सी बात के लिये उलझ रहे थे तुम लोग। परमहंस ने कहा- 'तुम्हारे प्रश्न का उतर तो बहुत सरल है। जो दूसरे को बड़ा समझता है, वही बड़ा भी है और श्रेष्ठ भी। यह समाधान पाकर वे दोनों मन में बहुत लज्जित हुए। उस दिन से बड़ा बनने की ललक और अहंकार का बीज ही मन से मिट गया।
"पूर्ण समर्पण"
श्री रामकृष्ण परमहंस शिष्यों को उपदेश दे रहे थे। वह समझा रहे थे कि जीवन में आये अवसरों को व्यक्ति साहस तथा ज्ञान की कमी के कारण खो देते हैं। अज्ञान के कारण उस अवसर का महत्त्व नही समझने पाते। समझकर भी उसके पूरे लाभों का ज्ञान न होने से उसमें अपने आपको पूरी शक्ति से लगा नहीं पाते शिष्यों की समझ में यह बात ठीक ढंग से न आ सकी तब श्री रामकृष्ण देव बोले- 'नरेन्द्र, कल्पना कर तू एक मक्खी है। सामने एक कटोरे में अमृत भरा रखा है। तुझे यह पता है कि यह अमृत है, बता उसमें एकदम कूद पड़ेगा या किनारे बैठकर उसे स्पर्श करने का प्रयास करेगा।'उत्तर मिला- किनारे बैठकर स्पर्श का प्रयास करूँगा। बीच में एकदम कूद पड़ने से अपने जीवन- अस्तित्व के लिए संकट उपस्थित हो सकता है। साथियों ने नरेन्द्र की विचारशीलता को सराहा। किंतु परमहंस जी हँस पड़े। बोले- ''मूर्ख। जिसके स्पर्श से तू अमरता की कल्पना करता है। उसके बीच में कूदकर, उसमें स्नान करके, सरावोर होकर भी मृत्यु से भयभीत होता है।''
"आध्यात्मिक उन्नति में जब तक आत्मशक्ति का पूर्ण समर्पण नहीं होता सफलता नहीं मिलती" यह रहस्य शिष्यों ने उस दिन समझा।
**ओम् श्री आशुतोषाय नम:**
"श्री रमेश जी"
