सर्व श्री आशुतोष महाराज जी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।
"डी बीयर्स" को हीरों की सबसे महंगी किस्मों में गिना जाता है। कहते हैं, दक्षिण अफ्रीका में इन हीरों से भरपूर खान मौजूद थी। पर सालों साल तक लोग इस बात से बेखबर रहे। एक दिन एक बच्चा यूं ही खेल खेल में चमकता पत्थर समझकर एक हीरा उठाकर ले गया। एक जौहरी की नजर उस पत्थर पर पडी, तो उसने उस बच्चे की मां से अनुरोध किया कि वे वह पत्थर उसे बेच दें। एक मामूली पत्थर जानकर, मां ने उसे यूंही दे दिया।परखने पर यह सिद्ध हो गया कि वह कोई चमचमाता पत्थर नहीं था। बल्कि कई लाख रुपयों की कीमत वाला हीरा था।
बंधुओ, हमारी गाथा भी कुछ-कुछ ऐसी ही है। हमारे भीतर इस दुनिया का सबसे अनमोल रत्न वह ईश्वर मौजूद है। पर हम उससे बेखबर हैं। दक्षिण अफ्रीका के हीरों की खान को तो फिर भी एक दिन पहचान लिया गया। परंतु हमारे अंदर के इस हीरे से हम ताउम्र बेखबर रहते हैं। ईश्वर के नाम पर बाहर से सबकुछ करते हैं। उसकी खोज में, उसके दर्शनों के लिए दूर दराज तीर्थ स्थलों पर भी जाते हैं। लेकिन बस अपने भीतर ही नहीं झांकते। इसी बात को संत अगस्तीन इन शब्दों में रखते हैं- 'मैं ईश्वर की खोज में दर दर भटका। मैने उसे शहरों में ढूंढ़ा, गलियों में तलाशा.. पर उसे पा नहीं पाया। कारण कि वह तो मेरे अंदर ही बैठा था... जहाँ मैने उसे खोजा ही नहीं।'
समस्त शास्त्र ग्रंथों का भी एकमेव स्वर में यही कहना है _ ईश्वर को बाहर नहीं, अपने भीतर ही पाया जा सकता है।
काहे रे बन खोजन जाई।
सरब निवासी सदा अलेपा तोही संगि समाई।
पुहप मधि जिउ बासु बसतु है मुकर माहि जैसे छाई।
तैसे ही हरि बसे निरंतरि घट ही खोजहु भाई।
माने कि प्रभु की खोज के लिए जंगलों में भटकने की क्या आवश्यकता है? वह तो सभी में निवास करता है। जिस तरह फूलोँ में सुगंध और दर्पण में हमारी परछाई छिपी हुई है, वैसे ही परमात्मा भी हमारे अंदर ही है। अतः उस परमात्मा की खोज अपने हृदय के भीतर ही करो।
**ओम् श्री आशुतोषाय नम:**
"श्री रमेश जी"
