सर्व श्री आशुतोष महाराजजी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।
यह संसार नश्वर है, दुखों का घर है। चिंताओं परेशानियों एवं विषय वासनाओं से भरपूर है। परंतु वह कौन सा स्थान है जहाँ पहुंच कर हम जन्म मरण एवं विषय वासनाओं की परेशानियों से परे पहुंच सकते हैं। जरूरत है उस घर को पहचानने की। कबीर दास जी कहते हैं -
"जिस मृत्यु के नाम से सभी भयभीत हो जाते हैं, मैं उसी मृत्यु का नाम सुनकर प्रसन्न होता हूँ। क्योंकि मरने के बाद ही मैं उस परमानंद में ही लीन रह कर शाश्वत जीवन की प्राप्ति कर सकता हूं।" इसलिए कहा है कि - संसार में संतों ने उसी को जीवित माना है जिसके हृदय में प्रभु का निवास है।
मनुष्य शरीर बहुत ही दुर्लभ है। परंतु भगवान ने दया दृष्टि के कारण जीव पर अपनी कृपा से इसे सुलभ करा दिया है। यह मानव शरीर संसार से पार होने के लिए एक सुन्दर नौका के समान है और यदि संत महात्मा के रूप में केवट रूपी गुरु मिल जाए। इसके उपरांत भी जो मनुष्य इस भवसागर को तरने का प्रयत्न नहीं करता, तो कहते हैं कि वह आत्म हत्यारा है।
मनुष्य, शरीर के भोग विलासों में ही इतना मस्त है कि वह केवल शारीरिक आनंद तक ही सीमित रह गया है। सुन्दर दास जी कहते हैं कि इस शरीर के अंदर तो गंदगी ही भरी हुई है। परंतु बाहर रंग पोता हुआ है। इसलिए इस शरीर की बाहरी सुन्दरता को देखकर व्यर्थ ही यह मत भूलो कि इस शरीर का क्या महत्व है।
अतः यह विचार करना है कि, संतों ने इस शरीर की इतनी महिमा क्यों गाई? क्योंकि इस शरीर के द्वारा ही प्रभु की प्राप्ति की जा सकती है। और यदि इस शरीर की प्राप्ति के बाद भी प्रभु की भक्ति नहीं की और विषय वासनाओं में ही संलिप्त रहे तो महापुरुषों ने ऐसे मनुष्य को, एक जानवर के तुल्य बताया है।
**ओम् श्री आशुतोषाय नम:**
"श्री रमेश जी"
