सर्व श्री आशुतोष महाराजजी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।
शास्त्रों में सामान्यतः संसार में मिलने वाले सुख एवं दुख के तीन भेद बताए गए हैं -
*आधिदैविक*- संसार में दैवीय प्रकोप के कारण जिन दुखों की प्राप्ति होती है उन्हें आधिदैविक कहते हैं। जैसे- सर्दी-गर्मी, बाढ़, भूकम्प, चक्रवात इत्यादि।
*आधिभौतिक*- संसार में मनुष्य को मनुष्य के द्वारा, पशु पक्षियों, पेड़ पौधों इत्यादि से दुखों की प्राप्ति होती है, उन्हें आधिभौतिक कहा जाता है।
*आध्यात्मिक*- आध्यात्मिक दुख दो प्रकार के होते हैं। मानसिक और शारीरिक।
मानसिक - मन की वृत्तियों द्वारा होने वाले दुखों को मानसिक कहा गया है। जैसे - राग, द्वेष, ईर्ष्या इत्यादि।
शारीरिक - शरीर में वात, पित्त, कफ के कारण जिन दुखों की प्राप्ति होती है, उन्हें शारीरिक दुख कहा गया है।
आज संसार में मनुष्य इन्हीं तीन प्रकार के दुखों से बचने के लिए सुख की खोज कर रहा है। सुख की तलाश में कभी सिनेमा घरों में जाता है तो कभ हिल स्टेशन पर। कभी शराब का सेवन करता है तो कभी भोगों को भोगता है। परंतु मनुष्य का यह प्रयास सुख की प्राप्ति नहीं, अपितु दुख को भूल जाने की चेष्टा मात्र है।
किसी महापुरुष ने कहा है "दुख को भूल जाना एक बात है, परंतु सुख की प्राप्ति हो जाना कुछ और। अक्सर मनुष्य दुख को भूल जाता है, सुख की प्राप्ति हेतु प्रयत्न नहीं करता।" जिस प्रकार कोई मनुष्य किसी दुख को भूलाने के लिए शराब का सहारा ले लेता है। परंतु प्रातः काल उठने पर परेशानी तो वैसी ही रहेगी। हाँ, यह जरूर हो सकता है कि नशे के कारण वह कोई नया संकट खड़ा करके और अधिक परेशान हो जाए।
यह बिडम्बना ही है कि मनुष्य ने भौतिक जगत की सम्पत्ति के द्वारा दुखों को दूर करने का निरर्थक प्रयास किया। इस प्रयास के द्वारा वह कुछ समय के लिए दुख को अवश्य भूल गया, लेकिन सुख की प्राप्ति में वह असफल ही रहा।
**ओम् श्री आशुतोषाय नम:**
"श्री रमेश जी"
