**ज्ञान की अग्नि ही ऐसी अग्नि है जो कर्म के बीज का नाश कर देती है**

 सर्व श्री आशुतोष महाराजजी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।

जो जीव मनुष्य तन की प्राप्ति के बाद प्रभु की भक्ति करता है, प्रभु का दर्शन करता है, तो उसके लिए कहा गया है कि "तमेव विदित्वाति मृत्युमेति" वह मृत्यु से पार हो जाता है। और  यदि जन्म मृत्यु का दुख ही कट गया, न जन्म रहा, न मृत्यु तब दुख किस बात का? भौतिक जगत के कष्ट स्वयं ही खत्म हो जाएंगे। और जहाँ भौतिक जगत की बात है तो कहते हैं- 

'देहधारी को दंड है बच सके ना कोय।

ज्ञानी भोगे ज्ञान से अज्ञानी भोगे रोय।।'

     भौतिक जगत में दुख तो सभी को भोगने पड़ते हैं। चाहे कोई सांसारिक व्यक्ति हो या संत महापुरुष। जिस प्रकार बच्चा डाक्टर से टीका लगवाने की बात सुनकर ही रोने लगता है क्योंकि वह अज्ञानी है। लेकिन एक बुद्धिमान मनुष्य स्वयं जाकर डाक्टर को फीस देता है और टीका लगवाता है। क्योंकि वह जानता है कि डाक्टर ही मेरी बिमारी को ठीक कर सकता है।

    संसार में सुख-दुख सभी पर आते हैं चाहे कोई संत हो या सांसारिक व्यक्ति। परंतु सांसारिक व्यक्ति दुख मिलने पर रोता है, जबकि संत दुख की चिंता नहीं करते। वह हँसते-हँसते दुखों को भोग जाते हैं। ज्ञान से जुड़े होने के कारण जानते हैं कि कर्मों का फल तो भोगना ही पड़ेगा। केवल ज्ञान की अग्नि ही ऐसी अग्नि है जो कर्म के बीज का नाश कर देती है। भगवान श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं -

"ज्ञानाग्नि सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते।"

       अतः हम यदि जीवन में शाश्वत सुख एवं शांति प्राप्त करना चाहते हैं तो जरूरत है कि हम पूर्ण सतगुरु की शरण में पहुँचकर आत्मज्ञान को प्राप्त करें। उसके बाद निरंतर ध्यान साधना व सत्संग करते रहने से जीवन सुखमय बन जाता है।

**ओम् श्री आशुतोषाय नम:**

"श्री रमेश जी"

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