**कर्मों की सार्थकता तभी है, जब प्रभु को समर्पित कर दिए जाएँ**

 सर्व श्री आशुतोष महाराजजी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।


गुरुवाणी में कहते हैं -

रहणु न पावहि सुरि नर देवा।

ऊठि सिधारे करि मुनि जन सेवा।।

    देवता मनुष्यों में से किसी का भी जीवन स्थिर नहीं है। इसलिए जीवन के लक्ष्य को सँवारने के लिए संतों की चरण धूलि ही कल्याणकारी है। कर्म भी तभी सार्थक होते हैं यदि वह परमात्मा के चरणों में समर्पित हो जाएँ।

     एक बार जब राजा बलि सौवां अश्वमेघ यज्ञ करने जा रहे थे तो उनके पास एक बटुकुमार भिक्षा लेने आए। राजा बलि ने कहा कि हे ब्राह्मण कुमार आपको जो चाहिए वह माँग लो। उस बटुकुमार ने कहा कि राजन मुझे केवल ढाई पग भूमि चाहिए। राजा बलि ने संकल्प देने के लिए जल माँग लिया। दैत्य गुरु शुक्राचार्य पहचान गए कि यह बटुकुमार नहीं वरन् ब्राह्मण कुमार के रूप में स्वयं भगवान विष्णु हैं। तब उन्होंने बलि को कहा कि "बलि यह बटुकुमार के रूप में विष्णु हैं।" तब बलि ने कहा कि यदि ये बटुकुमार नहीं अपितु विष्णु हैं, तब मैं इन्हें भिक्षा देने से कैसे इंकार कर सकता हूं। शुक्राचार्य ने राजा बलि से कहा कि ये अपने शरीर को बढ़ाकर एक पग से सारी पृथ्वी और दूसरे पग से सारा ब्रह्माण्ड नाप लेंगे, तब तीसरे पग के लिए तेरे पास स्थान नहीं रहेगा। अतः इस कारण पाप का भागी बनेगा।

     परंतु राजा बलि ने उनकी बात नहीं मानी। शुक्राचार्य ने श्राप दे दिया कि जिस सम्पत्ति का तुझे अभिमान है तू उस सम्पत्ति से वंचित हो जाएगा। परंतु बलि टस से मस नहीं हुए। वे बटुकुमार से बोले कि मैं आपके द्वारा नापी हुई ढाई पग भूमि आपको देने का वचन देता हूं। तब बटुकुमार ने अपना शरीर बढ़ाकर पहले ही पग में सारी पृथ्वी को नाप दिया और दूसरे पग से ब्रह्माण्ड को नाप दिया।

     उसके बाद बटुकुमार ने बलि से कहा, राजन, तुम्हारी सम्पत्ति को तो मैंने दो ही पग में नाप लिया है। अब तीसरा पग कहाँ रखूँ? तब बलि ने कहा कि भगवन, तीसरा पग आप मेरी नाक पर रखिए। नाक अहंकार का प्रतीक है।

    इस प्रकार बलि का प्रण पूर्ण हुआ। तब प्रभु ने बलि को विष्णु के रूप में दर्शन दिए और पाताल का राज्य दे दिया। प्रभु ने कहा मैं तुम्हारे भक्ति भाव से बहुत प्रसन्न हूँ। तुम सबकुछ जानने के बाद भी अपने प्रण पर अडिग रहे। अतः मांगो तुम्हें क्या चाहिए। बलि ने कहा कि प्रभु मेरी यही प्रार्थना है कि मुझे प्रत्येक द्वार पर आपके दर्शन हों। प्रभु ने उसकी यह मनोकामना पूरी कर दी।

     इस तरह यह स्पष्ट हो जाता है कि कर्मों की सार्थकता तभी है, जब प्रभु को समर्पित कर दिए जाएँ।

**ओम् श्री आशुतोषाय नम:**

"श्री रमेश जी"

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