सर्व श्री आशुतोष महाराजजी का चिंतन(अनमोल वचन) प्रस्तुतिकरण श्री आर सी सिंह जी।
संसार के सम्पूर्ण भौतिक ज्ञान को उपनिषत्कारों ने अविद्या कहा है, जिसे हम विज्ञान कहते हैं। क्योंकि आज के इस विज्ञान के द्वारा केवल भौतिक जगत की वस्तुओं को ही भोगा जा सकता है। परंतु इस भौतिक जगत के पीछे भी एक अदृश्य सत्ता विद्यमान है, जिसे हम परमात्म तत्व से सम्बोधित करते हैं। वही मानवीय जीवन का स्रोत है। जगत के भीतर यही तत्व है जो जगत को भी नियन्त्रित किए हुए है। यथार्थ सत्ता तो उसी परमात्म तत्व की है। उपनिषद में कहा गया है कि जो मनुष्य इस भौतिक जगत को सब कुछ माने बैठे हैं वास्तव में वे अविद्या से ग्रसित हैं। वे स्वयं को बहुत विद्वान मानते हैं। यदि अन्धे व्यक्ति को रास्ता दिखाने वाला भी अन्धा ही मिल जाए तो दोनों निश्चित स्थान पर न पहुँचकर कहीं भी गढ्ढे में गिर सकते हैं।
उसी प्रकार मूर्ख लोग भी जो भौतिक जगत के भोगों की इच्छा रखते हुए कार्य करते हैं, वे नाना प्रकार की योनियों में भटकते हुए कई जन्मों तक अनंत यातनाओं को भोगते हुए दुखी होते रहते हैं। प्रत्यक्ष रूप से सुख रूप प्रतीत होने वाले जगत के भोगों को भोगने वाले मनुष्य जीवन का बहुमूल्य समय व्यर्थ ही नष्ट कर डालते हैं। इसीलिए कठोपनिषद में कहा है कि -
'जगत को भौतिक दृष्टिकोण से देखने वालों की बुद्धि वास्तव में एक बालक के समान है, जो प्रमादी है, आलसी है। उसे इस संसार से परे और कुछ भी दिखाई नहीं देता। परंतु आध्यात्मिक दृष्टिकोण वाले व्यक्ति की बात बहुत विरले लोग ही सुनते हैं। वह इस संसार को ही नहीं वरन् इस संसार के पार भी देखते हैं।'
रामचरित मानस में कहा गया है -
'नाम रूप गति अकथ कहानी।
समुझत सुखद न परति बखानी।।'
परम तत्व परमात्मा नाम रूप इत्यादि से भिन्न है अर्थात् न उसका कोई नाम है न रूप है। वह तो जीवन की एक दिशा है।
**ओम् श्री आशुतोषाय नम:**
"श्री रमेश जी"
