*मस्तिष्क को जागृत करो*!

        सर्व श्री आशुतोष महाराज जी की कृपा वर्षा

जिस वैल्यू एजुकेशन को आज प्रस्तावित किया जा रहा है, वह मस्तिष्क का गोदाम बन जाना है। ऐसा गोदाम, जहां महज वैचारिक मूल्य की भारी-भारी बोरियां भरी हुई हो! ध्यान दीजिए, एक गधे की पीठ पर लदा बोझ उसे कदापि कोई लाभ नहीं पहुंचता। भार तो भार ही है! फिर यह भार हरि -ताजी  घास या पौष्टिक चारे का क्यों न हो! लाभ तो तभी है, जब गधा इस घास चारे को चबा-चबाकर कर खाए, हजम करें और उसके माध्यम से जीवन- ऊर्जा उत्पादित कर स्वस्थ एवं बलिष्ठ हो। हमारे शिक्षार्थियों में यही पाचन व  मेटाबांलिक क्रियाएं ठप पड़ी है, जिन्हें अध्यात्म ही जागृत कर सकता है। सद्गुरु से ब्रह्मज्ञान प्राप्त कर, ध्यान साधना अवश्य करें। बहुत से लोगों के यह मिथ्या धारणा है कि एकाग्रता यानि कांसेन्ट्रेशन का दूसरा नाम है ध्यान (मेडिटेशन) है। परंतु हमारे  *गुरुदेव श्री आशुतोष  महाराज जी* समझया करते हैं-ध्यान कांसेन्टेशन नहीं है, बल्कि ध्यान से प्राप्त होने वाली बहुत से लभो में से एक लाभ है-एकाग्र शक्ति का बढ़ना। जब हम ध्यान के गहराइयों में आत्मा के संपर्क में आते हैं, तो उसकी अथाह ऊर्जा से हमारा तन, मन और मस्तिक सभी ऊर्जायित हो उठते हैं। दिमाग को एक नई स्फूर्ति मिलती है। साथी ध्यान अवस्था में मस्तिष्क के भीतर कुछ ऐसे रसायनों का स्राव होता है, जिससे हमारे बुद्धि कुशाग्र व स्मृति तेज होती है। इसलिए स्मृति बढ़ाने का सबसे कारगर साधन है-साधना इसे नियमित रूप से करें। 

ॐ श्री आशुतोषाय नमः 

श्री सियाबिहारी जी ✍️

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